जय गिरिधर गोपाल | चतुल-दृक्, रस और सेवा
जय गिरिधर गोपाल | चतुल-दृक्, रस और सेवा
नन्दकुमार है भाई। नन्द अर्थात् आनन्द का आश्रय, कुमार अर्थात् नित्य-किशोर। अपुन का सर्वात्मना है भाई, सबका अन्तरात्मा। वन में रहता है, पर वह वन भी उसकी सेवा करता है। वृन्दावन अर्थात् वृन्दरूप सेवा-समूह; धाम अर्थात् जो भक्तों को धारण करे। भौम ब्रज केवल भूगोल नहीं, भूदेवी का प्रेम-विग्रह है। यह समस्त भुवन भी उसकी सेवा में प्रवृत्त है।
सुन्दर है भाई... कैसे जाएँ? बस देखते रहो। स्माइल है भाई, बहुत मनमोहक। और देखने का लोभ बढ़ता ही जाता है। क्यों? क्योंकि उसकी चतुल-दृक् है। चतुल अर्थात् चञ्चल, लीलामयी। अञ्चल अर्थात् वक्र, कोना। दृक् अर्थात् रस-ग्रहण कराने वाली दृष्टि। यह अञ्चल-कटाक्ष रस का स्रोत खोल देता है। आँखों के कोने से रस-रचना होती है। वही रसोच्चल, वही रस का उच्छलन। चतुलता और अञ्चलता मिलकर हृदय में रस का फव्वारा फोड़ देती हैं। इसी से राधा में मदन-विकार जागता है। विकार अर्थात् प्रेम का दिव्य परिणाम, लौकिक विकृति नहीं। यहाँ दृष्टि ही दृक् बन जाती है।
फिर देखो उसका विहार। वि-हृ... स्वातन्त्र्य से रमण करना ही विहार है। कुछ काम नहीं भाई, केवल लीला। भगवान् को कुछ प्राप्त नहीं करना, क्योंकि वे पूर्ण हैं। इसलिए उनकी प्रत्येक चेष्टा आनन्द-विलास है। कालिय-नृत्य हो या रास-नृत्य, दोनों मोह लेते हैं। जो विषयों से मोहित है, वह भी धीरे-धीरे लीला से मोहित हो जाता है। यही भगवान् की करुणा है। विमुख को सम्मुख लाने का दिव्य उपाय।
वह सुहृत् सनातन है भाई। सु-हृत् अर्थात् जो हृदय का सदा हित चाहे। सनातन अर्थात् जो त्रिकाल-अबाधित, नित्य और शाश्वत है। निज-वल्लभ-जन का रक्षण भी वही, पालन भी वही। इसलिए कम्पेयर मत करो भाई। हर एक का प्रारब्ध अपना है। अपना केवल एक ही मक़सद हो... भगवान् की सेवा हो जाए। सेवा कैसे होगी? नाम जपो भाई। नाम से भगवान् चित्त में आ जाते हैं। फिर जीवन बन जाता है। और कुछ नहीं चाहिए ज़िन्दगी में भाई। बस बोलो...
जय गिरिधर गोपाल!
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